मुलाकात

मुलाकात

भूलकर खुद को, गर मुलाकात की होती

हर दफा न सही, बस एक बार की होती

तो यादों का एक अनोखा कारवां होता

और मुकम्मल, एक हसीं दास्ताँ होती,

जो देखा होता, मेरी आँखों में गौर से तूने

तो बयां, इन्तेहाँ , मेरे इंतज़ार की होती,

न रखता आस तुझसे मुहाबत की मै

और न शिकायत तेरे इनकार से होती

गर समझा होता दोस्त ही तूने मुझे

तो ये आँखे न सही, बातें तो चार होती |

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